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बोलना और प्रतिक्रिया करना जरूरी है लेकिन,संयम और सभ्यता का दामन नहीं छूटना चाहिए। हमारे जीवन में अच्छे लोगों का महत्व दिल की धड़कनों की तरह ही है, वह दिखाई नहीं देते लेकिन हमारे जीने का सहारा हैं।
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"अच्छे लोग" बहुत ही सस्ते होते हैं। बस मीठा बोलो और खरीद लों ! शायद इसीलिए लोग उनकी "कीमत" नहीं समझते।
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रिश्तों मे तकरार का एक ही कारण है, मैं सही, तुम गलत। कीमत दोनों की चुकानी पड़ती है। बोलने वाले को भी और चुप रहने वाले को भी। इसलिए वास्तव में वही समझदार है, जिसे ये ज्ञान हो जाये कि कहां बोलना है और कहां चुप रहना है।
सही “मौके” पर “खड़े” होकर बोलना एक “साहस” है उसी प्रकार “खामोशी” से बैठकर दूसरों को “सुनना” भी एक “साहस” है।