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पुण्य किसी को दगा नहीं देता और पाप किसी का सगा नहीं होता जो कर्म को समझता है उसे धर्म को समझने की जरूरत ही नहीं संपत्ति के उत्तराधिकारी कोई भी या एक से ज्यादा हो सकते है लेकिन कर्मों के उत्तराधिकारी केवल हम स्वयं ही होते है l
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जब चलना नहीं आता था, तब कोई गिरने नहीं देता था। और जब चलना सीख लिया तो, हर कोई गिराने में लगा है। यही जीवन की सच्चाई है।
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"आनद" एक आभास है, जिसे हर कोई ढूंढ रहा है "दुख" एक अनुभव है, जो हर एक के पास है फिर भी जिंदगी में वही कामयाब है जिसको खुद पर विश्वास है।
“वाणी” और “पानी” दोनों में ही “छवि” नज़र आती है “पानी” स्वच्छ हो तो “चित्र” नज़र आता है “वाणी” मधुर हो तो “चरित्र” नज़र आता है।