दुनिया में दान जैसी कोई सम्पत्ति नहीं, लालच जैसा कोई और रोग नहीं, अच्छे स्वभाव जैसा कोई आभूषण नही, और संतोष जैसा और कोई सुख नहीं।

दुनिया में दान जैसी कोई सम्पत्ति नहीं, लालच जैसा कोई और रोग नहीं, अच्छे स्वभाव जैसा कोई आभूषण नही, और संतोष जैसा और कोई सुख नहीं।

दुनिया में दान जैसी कोई सम्पत्ति नहीं, लालच जैसा कोई और रोग नहीं, अच्छे स्वभाव जैसा कोई आभूषण नही, और संतोष जैसा और कोई सुख नहीं।

दुनिया में दान जैसी कोई सम्पत्ति नहीं, लालच जैसा कोई और रोग नहीं, अच्छे स्वभाव जैसा कोई आभूषण नही, और संतोष जैसा और कोई सुख नहीं।

यदि आप के चंद मीठे बोल से किसी का रक्त बढ़ाता है तो यह भी “रक्तदान” है। यदि आप के द्वारा किसी की पीठ थपथपाने से उसकी थकावट दूर होती है तो यह “श्रम दान” है। यदि आप कुछ भी खाते समय उतना ही प्लेट में लेते हैं कि कुछ भी व्यर्थ ना जाए तो यह “अन्न दान” है।

यदि आप के चंद मीठे बोल से किसी का रक्त बढ़ाता है तो यह भी “रक्तदान” है। यदि आप के द्वारा किसी की पीठ थपथपाने से उसकी थकावट दूर होती है तो यह “श्रम दान” है। यदि आप कुछ भी खाते समय उतना ही प्लेट में लेते हैं कि कुछ भी व्यर्थ ना जाए तो यह “अन्न दान” है।

दुनिया में दान जैसी कोई सम्पत्ति नहीं, लालच जैसा कोई और रोग नहीं, अच्छे स्वभाव जैसा कोई आभूषण नही, और संतोष जैसा और कोई सुख नहीं।

जिंदगी अच्छे और बुरे दोनों पलों से मिलकर बनी है, दोनों का अपना अपना स्वाद है। एक के बिना दूसरा अधूरा है, अतः न तो कभी खुशी में ज्यादा इठलाएं, न ही कभी गम को दिल से लगाएं।

जिंदगी अच्छे और बुरे दोनों पलों से मिलकर बनी है, दोनों का अपना अपना स्वाद है। एक के बिना दूसरा अधूरा है, अतः न तो कभी खुशी में ज्यादा इठलाएं, न ही कभी गम को दिल से लगाएं।

दुनिया में दान जैसी कोई सम्पत्ति नहीं, लालच जैसा कोई और रोग नहीं, अच्छे स्वभाव जैसा कोई आभूषण नही, और संतोष जैसा और कोई सुख नहीं।

अपने स्वभाव को हमेशा सूर्य की तरह रखिए, ना उगने का अभिमान ना  डूबने का डर। जीवन में तूफान आने भी ज़रूरी हैं क्यूंकि तभी पता चलता है कि कौन हाथ पकड़ता है, कौन हाथ छोड़ देता है। 

अपने स्वभाव को हमेशा सूर्य की तरह रखिए, ना उगने का अभिमान ना  डूबने का डर।  जीवन में तूफान आने भी ज़रूरी हैं क्यूंकि तभी पता चलता है कि कौन हाथ पकड़ता है, कौन हाथ छोड़ देता...
दुनिया में दान जैसी कोई सम्पत्ति नहीं, लालच जैसा कोई और रोग नहीं, अच्छे स्वभाव जैसा कोई आभूषण नही, और संतोष जैसा और कोई सुख नहीं।

बल और शक्ति की आज्ञा टालना आसान है मगर प्यार की आज्ञा टालना आसान नहीं हैं। लक्ष्य अगर सर्वोपरि है तो फिर आलोचना तारीफ विवेचना कुछ मायने नहीं रखती है l 

बल और शक्ति की आज्ञा टालना आसान है मगर प्यार की आज्ञा टालना आसान नहीं हैं। लक्ष्य अगर सर्वोपरि है तो फिर आलोचना तारीफ विवेचना कुछ मायने नहीं रखती है l