आज भी हमारे देश में कई गाँव – शहर ऐसे है जो आधुनिक सोच को बढ़ावा नहीं देते हैं, जहां लड़कियों को पढ़ने या बाहर जाने से मना किया जाता है। आज की कहानी उन्हीं में से एक गाँव के एक महिला की है, जिन्होने परिवार एवं समाज के कठिनाईयों को पार करते हुए आज विश्व पटल पर अपना नाम अंकित किया है। यह कहानी है श्रीमती कांता देवी हुड्डा जी (Ms. Kanta Devi Hudda) की, जिन्होंने अपना नाम स्वर्णिम अक्षरों से गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड (Golden Book of World Record) में दर्ज कराया है। यह कहानी उनके बचपन से लेकर वर्ल्ड रिकार्ड बनाने तक का सफर है, आइए इनकी कहानी को विस्तार से जानते हैं –
श्रीमती कांता देवी जी हरियाणा के हिसार (Hisar, Haryana) की रहने वाली है यें वर्तमान में 56 वर्ष की हैं। यह बचपन से ही पढ़ाई में मध्यम ही रही है। उस समय लड़का – लड़की में फर्क़ अधिक होने की वज़ह से ल़डकियों को गांँव से बाहर जा कर कुछ करने की सहमति नहीं मिलती थी, फिर भी इनके अंदर कुछ कर – गुजरने का ज़ज्बा था तो इन्होंने हार नहीं मानी। इनके पिता जी BSF में थे। किसी तरह उनको मना कर कॉलेज मे एनसीसी (NCC) ले ली जिसके कारण इन्हें कई बार बाहर जाने का मौका मिला, मगर इन्हें दिल्ली जाने का मन था जिसका मौका उन्हें अभी तक नहीं मिला था। इसी बीच कांता देवी जी ने कुछ बार रक्तदान भी किया जिसमें से एक बार एक ऑफिसर ने रक्तदान के समय ली गई फोटो एक धन्यवाद पत्र के साथ घर पोस्ट कर दिया जिसे घरवाले देख कर नाराज हो गए जिसके कारण चाचा जी से मार भी पड़ी और बहुत डांट भी लगाई परन्तु इसके बाद भी इन्होंने haar नहीं मानी।
सन् 1992 में इनका सलेक्शन गणतंत्र दिवस परेड के लिए हुआ जो दिल्ली में था, ये पूरे हरियाणा से इकलौती लकड़ी थी जिसका चयन NSS की तरफ से हुआ था। NCC की तरफ से कोशिश के बाद भी चयन नहीं हो पाया था। उस समय कांता देवी जी BA 3rd YEAR में थी। इन्हें दिल्ली रिपब्लिक डे परेड में शामिल होने का जुनून था जिसका मौका उन्हें अब मिल गया था। कांता देवी जी दिल्ली में एक माह रहीं और वहां इन्हें बहुत कुछ सीखने को मिला।
जब ये दिल्ली से घर वापस आयीं तो किसी ने इनके मेडल या सर्टिफिकेट में कोई ध्यान नहीं दिया और न ही कोई सराहना की। घरवालों में सिर्फ इनकी माँ ही इन पर विश्वास था जो इनको आगे बढ़ने की प्रेरणा देती थी। इनके भाई – बहनों से भी इन्हें बहुत साथ मिला। यूनिवर्सिटी, कॉलेज और अखबारों पर इनकी सराहना की, जिसकी खबर इन्हें कॉलेज से मिली। इन्होंने MA और B. ED. भी किया, मगर 1995 में इनकी शादी हो गई एवं ससुराल वालों ने इनके नौकरी करने से सख्त मना कर दिया। इसी समय इनकी सासू माँ बीमार रहने लगी। समय के साथ यें भी घर के कामों में व्यस्त रहने लगी। इनके दो बेटे भी है। कुछ समय बाद इनके कमर में दर्द रहने लगा जिसकी दवां शुरू तो किया मगर जब उसी समय इनका एक्सीडेंट हो गया एवं खुनी दस्त भी आने लगे तो इनकी दवाईयां बंद हो गई। इसी तरह 15 -16 साल गुजर गये।
अब ससुराल में इनके पति इनका पूरी तरह से देने लगे थे और कहा – नौकरी नही कर पाई तो क्या अभी भी बहुत कुछ कर सकती है। जो मन हो वो कर जिससे आगे का समय अच्छे से गुजरे। इसी बीच इनकी मुलाकात श्रीमती सरला विश्नोई जी (Ms. Sarala Vishnoei) से हुई जिन्होंने इन्हें बताया कि पतंजलि का शिविर हिसार में लगा हुआ है। जहां ये गई थी और वहां से ये समितियों में आने जाने लगी और यहाँ से इनके नए जीवन का शुरुआत हुआ। अब इन्होंने खुद के कमर दर्द को योग के माध्यम से ठीक करने का ठान लिया, जिसके लिये ये एक 25 दिन के शिविर में गई। इन्होने वहा योगाभ्यास पूर्ण रूप से नहीं सीख पाई परन्तु वहा इनकी मुलाकात पतंजलि के युवा योग प्रभारी गुरु श्री अनिल पानू जी (Mr. Anil Paanu) से हुई। सभी ने बताया कि ये अच्छा योग सिखाते है तो इन्होंने अनिल पानु जी की छात्रा बनकर 8 माह लगातार योग अभ्यास सीखा। योग की मदद से इनका कमर दर्द भी ठीक हो गया।
कांता देवी जी, गुरु अनिल पानु जी की उम्र में सबसे बड़ी छात्रा थी जिन्होंने इन्हें लोहे की सरिया को मोड़ने की सलाह दी। तब इन्होंने इसे अपना लक्ष्य बना लिया और अपने गुरु के साथ मिल कर कड़ी मेहनत की। इन्होंने पहली ही बार में ही 9 mm की सरिया को मोड़ दिया था लेकिन ये वहा रुकीं नहीं बल्कि और कड़ी मेहनत की और अपने ही रिकार्ड को तोड़ दिया। इस बार उन्होंने 12 mm की लोहे की सरिया को गले की मदद से मोड़ते हुए “गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड” में अपना नाम दर्ज करवाया।
वर्ल्ड रिकार्ड बनाने के बाद उन्होंने कहा – मुझे बहुत खुशी हो रही हैं, मैं और भी बहुत कुछ कर सकती हूँ। मैं आज 12 बर्षों से इस काम में लगी हुई हूँ। हरियाणवी संस्कृति को बढ़ाने का प्रयास करती हूँ। कई महिलाओं को योग से फ़ायदा ले चुकी हैं, मैं उनको मंच देती हूँ, मोटिवेशन देती हूँ और आगे बढ़ने में मदद करती हूँ।
इन्होंने समाज के लिए भी बात कहीं:- माँ – बाप अपनी बेटियों को कम ना समझे बल्कि उनका सहयोग करे, उन्हें हौसला दें। उन्हें सिर्फ ग्रह – गृहस्थी में न फंसाये। आजाद हिन्दुस्तान में जीने का मौका दें। उन्होंने कहा – बेटा आपका वंश चलाता है परंतु बेटी भी किसी का वंश चलाती है, इन्हें सकारत्मक ऊर्जा दें, पहचान दें। लड़का और लड़की में भेदभाव ना करें।
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