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एक व्यक्ति ने भगवान से पूछा, तुझे कैसे रिझाऊं मैं। कोई वस्तु नहीं ऐसी जिसे तुझ पर चढाऊं मैं, "भगवान ने उत्तर दिया" संसार की हर वस्तु तुझे मैनें ही दी है। तेरे पास अपना सिर्फ तेरा "अहंकार" है,जो मैनें नहीं दिया। उसी को तु मुझे "अर्पण" कर दे,"तेरा जीवन सफल हो जाएगा"
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"सारी मुसीबतें" रुई से भरे थैले की तरह होती हैं, देखते रहेंगे तो बहुत भारी दिखेंगी और उठा लेंगे तो एकदम हल्की हो जाएंगीं।
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बल और शक्ति की आज्ञा टालना आसान है मगर प्यार की आज्ञा टालना आसान नहीं हैं। लक्ष्य अगर सर्वोपरि है तो फिर आलोचना तारीफ विवेचना कुछ मायने नहीं रखती है l
सही “मौके” पर “खड़े” होकर बोलना एक “साहस” है उसी प्रकार “खामोशी” से बैठकर दूसरों को “सुनना” भी एक “साहस” है।