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" खूबी" और "खामी" दोनों होती हैं हर इंसान में, बस "फर्क" इतना सा है कि। जो "तराशता" है उसे "खूबी" नजर आती है, और जो "तलाशता" है उसे "खामी" नजर आती है।
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हम न नास्तिक है न आस्तिक, हम तो केवल वास्तविक है। जो अच्छा लगे उसको ग्रहण करो, जो बुरा लगे उसका त्याग करो फिर चाहे वो विचार हो, कर्म हो, या धर्म हो।
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दुख: ही इंसान का सबसे सच्चा मित्र है जब तक साथ रहता है,तो बहुत सबक सिखाता है और जब छोड़कर जाता है तो सुख देकर जाता है.!!
जो चाहा वह मिल जाना सफलता है। जो मिला है उसको चाहना प्रसन्नता है।