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जब चलना नहीं आता था, तब कोई गिरने नहीं देता था। और जब चलना सीख लिया तो, हर कोई गिराने में लगा है। यही जीवन की सच्चाई है।
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"बोलना" और "प्रतिक्रिया" करना जरूरी है लेकिन "संयम" और "सभ्यता" का दामन नहीं छूटना चाहिये आजाद रहिये "विचारों" से परन्तु बंधे रहिये "संस्कारों" से।
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पुण्य किसी को दगा नहीं देता और पाप किसी का सगा नहीं होता जो कर्म को समझता है उसे धर्म को समझने की जरूरत ही नहीं संपत्ति के उत्तराधिकारी कोई भी या एक से ज्यादा हो सकते है लेकिन कर्मों के उत्तराधिकारी केवल हम स्वयं ही होते है l
जिंदगी का सच हम भी वही है,संबंध भी वही हैं,रास्ते भी वही है। बदलते हैं,तो सिर्फ ‘समय,संजोग और नजर।