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“समय" के फैसले कभी गलत नहीं होते, बस साबित होने में समय लगता है, “स्वयं" को स्वयं ही खुश रखें, ये जिम्मेदारी किसी और को ना दें।
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जो समय "चिंता" में व्यतीत होता है वह "कूड़ेदान" में जाता है और जो समय "चिंतन" में व्यतीत होता है वह "तिजोरी" में जमा होता है।
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"खामोश" चहरे पर हजारो पहरे होते है। हँसती "आँखों" में भी ,"जख्म" गहरे होते है, जिनसे अक्सर "रूठ" जाते है हम, असल में उनसे ही, रिश्ते ज्यादा "गहरे" होते है।
“अच्छे लोग” बहुत ही सस्ते होते हैं। बस मीठा बोलो और खरीद लों ! शायद इसीलिए लोग उनकी “कीमत” नहीं समझते।