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कर्मों की आवाज़ शब्दों से भी ऊँची होती है I यह आवश्यक नहीं कि हर लड़ाई जीती ही जाए I आवश्यक तो यह है कि हर हार से कुछ सीखा जाए तब तक कमाओ जब तक "महंगी" चीज "सस्ती" ना लगने लगे चाहे वो सामान हो या सम्मान।
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"बोलना" और "प्रतिक्रिया" करना जरूरी है लेकिन "संयम" और "सभ्यता" का दामन नहीं छूटना चाहिये आजाद रहिये "विचारों" से परन्तु बंधे रहिये "संस्कारों" से।
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यदि आप में दूसरों के लिए "प्रार्थना" और "सेवा" करने की आदत है। तो आपको स्वयं के लिए "प्रार्थना" करने की आवश्यकता नहीं होगी।