जिस प्रकार “पानी” के बगैर, “नदी” का कोई मतलब नहीं रह जाता है, उसी प्रकार “मधुरता” के बगैर, “संबंधों” का कोई अर्थ नहीं रह जाता है।

जिस प्रकार “पानी” के बगैर, “नदी” का कोई मतलब नहीं रह जाता है, उसी प्रकार “मधुरता” के बगैर, “संबंधों” का कोई अर्थ नहीं रह जाता है।

जिस प्रकार “पानी” के बगैर, “नदी” का कोई मतलब नहीं रह जाता है, उसी प्रकार “मधुरता” के बगैर, “संबंधों” का कोई अर्थ नहीं रह जाता है।

जिस प्रकार “पानी” के बगैर, “नदी” का कोई मतलब नहीं रह जाता है, उसी प्रकार “मधुरता” के बगैर, “संबंधों” का कोई अर्थ नहीं रह जाता है।

हम न नास्तिक है न आस्तिक, हम तो केवल वास्तविक है। जो अच्छा लगे उसको ग्रहण करो, जो बुरा लगे उसका त्याग करो फिर चाहे वो विचार हो, कर्म हो, या धर्म हो।

हम न नास्तिक है न आस्तिक, हम तो केवल वास्तविक है। जो अच्छा लगे उसको ग्रहण करो, जो बुरा लगे उसका त्याग करो फिर चाहे वो विचार हो, कर्म हो, या धर्म हो।

जिस प्रकार “पानी” के बगैर, “नदी” का कोई मतलब नहीं रह जाता है, उसी प्रकार “मधुरता” के बगैर, “संबंधों” का कोई अर्थ नहीं रह जाता है।

हमे जो मिला है, हमारे भाग्य से ज्यादा मिला है यदि आपकी पाँव में जूते नहीं हैं तो अफसोस मत कीजिये दुनियां में तो कई लोगों के पास पाँव ही नहीं है।  

हमे जो मिला है, हमारे भाग्य से ज्यादा मिला है यदि आपकी पाँव में जूते नहीं हैं तो अफसोस मत कीजिये दुनियां में तो कई लोगों के पास पाँव ही नहीं है।  

जिस प्रकार “पानी” के बगैर, “नदी” का कोई मतलब नहीं रह जाता है, उसी प्रकार “मधुरता” के बगैर, “संबंधों” का कोई अर्थ नहीं रह जाता है।

जो समय “चिंता” में व्यतीत होता है वह “कूड़ेदान” में जाता है और जो समय “चिंतन” में व्यतीत होता है वह “तिजोरी” में जमा होता है।

जो समय “चिंता” में व्यतीत होता है वह “कूड़ेदान” में जाता है और जो समय “चिंतन” में व्यतीत होता है वह “तिजोरी” में जमा होता है।